"वनगमन"दरअसल यात्रा का ही पर्याय है. घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर प्रकृति के अनूठे सौंदर्य के दर्शन करना. खिलतामौसम, खिलखिलाता जीवन, नदियों का गूंजता स्वर, पहाड़ियों का एकांत, समुद्र की पछाड़, दमकता सूरज, घने वनपठारों का विस्तार, कितने ही रंग और रूप बदलते आसमान के नीचे, कितने ही रुपों में बसता लोक-जीवन, जहाँ सभी ओर प्रकृति का अनूठा राग बज रहा होता है, देखने और समझने का अवसर प्रदान करता है. यदि माता कैकेई राम को वन जाने का आदेश नहीं देतीं, तो शायद ही राम प्रकृति से इतना घनिष्ठ तादात्म्य स्थापित कर पाते.
"वनगमन"का तात्पर्य तो देश को जानना भी है. इसका मतलब देश की ऊर्जा और उस जीवनशक्ति को जानना है, पहचानना है, जो हजारों साल से सकारात्मक रुप से रची-बसी थी.लेकिन किन्हीं कारणॊं से वह नकारात्मकता से घिर गई थी. राम को वनगमन का आदेश देने के पीछे माता कैकेई की दूरदृष्टि का ही सुपरिणाम था कि वे शोषित-पीढ़ित और वंचितजनों की आवाज सुन पाए. उनके दुःख दूर कर पाए और उन्हेंघोर निराशा के अंधकार से बाहरनिकाल पाए. अगर माता कैकेई राम को वन नहीं भेजतीं तो, राम केवल जीवन भर के लिएअयोध्या के शासकभर बने रहते. वे राम के शौर्य को, उनके पराक्रम को जानती थीं. वे जानती थीं कि राम ही एक ऐसा अकेला व्यक्ति है, जो रावण-राज के अस्तित्व को सदा-सदा के लिए मिटा सकता है.
"वनगमन"एक अन्य अर्थ में ऊर्जा का "विस्फ़ोट"होना भी हुआ. अपनी यात्रा के समय जो व्यक्ति,राग-द्वेषसे जितना दूर होगा, उतना ही उसके चेहरे पर प्रसन्नता का भाव आएगा.
यात्रा एक आंतरिक संतुलन भीस्थापित करती है और जब वह स्थापित हो जाती है,तो सारी आंतरिक शक्तियाँ जागृत होकर बाहर आने को छटपटाने लगती हैं. इस असाधारण विस्फ़ोट को हम अद्भुत चमत्कार, अलौकिक या फ़िर जादू जैसा नाम भी दे सकते हैं.
"वनगमन"- एक मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक और अध्यात्म से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है. जब हमारी अपनी मूल प्रकृति पर हमारा आधिपत्य होने लगता है तो एक विलक्षण सृजनात्मकता का उदय होता है. इस तरह श्रीराम अपनी मूल प्रकृति तक पहुँचे.
राम किस तरह निखरेंगे, वेकिस तरह वे अपनी स्वभाविक प्रवृत्ति से जन-नायक बनेंगे,कैकेईजी बखूबी जानतीथीं. यही कारण थे कि वे जन-नायक कहलाए. इसका सारा श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह केवल माता कैकेई जीको हीजाता है.
वे स्वयं क्षत्राणी थीं. वे कई बार महाराज दशरथ जी के साथ युद्ध के मैदान में गईं थीं. एक कुशल रथ संचालनसे लेकर,शस्त्र चलाने में भीवे पारंगत थी. इतना ही नहीं, वे राजकाज के संचालन में सहयोगी तो थी ही थी. लेकिन उनकी दूरदृष्टि समूचे आर्यावृत्त पर भी टिकी रहतीथी. युद्ध के मैदान में उन्होंने अनेक दानवों को मार गिराया था, लेकिन समूल नष्ट नहीं कर पायी थीं. इसका दुःख तो उन्हें बराबर बना रहा. वे बराबर इस प्रयास में निरत रहती थीं कि भारत की संस्कृति को, भारत के सनातन धर्म को कैसे बचाया जा सकता है?. उनकी पारखी नजरों ने राम को पहचान लिया था. अपना सुख, वैभव यहाँ तक कि अपने सुहाग को भी दांव पर लगाकर, उन्होंने राम को वन जाने की आज्ञा दीथी. चौदह बरस का बननास तो दिया ही दिया,साथ में एक कड़ी शर्त औरजोड़ दी कि राम को इस चौदह वरस की अवधि में "विशेष उदासी"बन कर रहना होगा.
इस "विशेष उदासी"के पीछे गहरा भाव यह था कि राम,किसी भी गाँव या नगर में प्रवेश नहीं करेंगे., संकेत स्पष्ट है कि उस समय भी अनेक राजा-महाराजा तो रहे ही होंगे, लेकिन किसी ने भी रावण के बढ़ते अत्याचार के विरुद्ध,न तो आवाज उठाई और न ही शस्त्र. वे कदापि नहीं चाहती थीं कि ऐसे अकर्मण्य़ राजाओं का साथ राम को लेना पड़े..अतः उसे स्वयं की शक्ति अर्जित करनी होगी और रावण-राज को समूल नष्ट करके,अयोध्या की गौरव-गाथा का गान अमर करना होगा..
वे राम के व्यक्तित्व से संसार को परिचित करवाना चाहती थीं. वे जानती थीं कि व्यक्तित्व के गढ़ने का प्राकृतिक नियम है प्रकृति के बीच जाकर, वहाँ संघर्ष करके, जूझकर अपने व्यक्तित्व को गढ़ना. रामजी ने अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में जाकर अल्पकाल में सारी विद्याएं प्राप्त कर ली थीं. ज्ञान तो मिल गया था, लेकिन व्यक्तित्व नहीं बन पाया था. राम स्वयं इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि ज्ञान के बल पर राज्य तो चलाया जा सकता है, लेकिन उसे बनाया या बचाया नहीं जा सकता.
राम का व्यक्तित्व संघर्षशील है.श्रम-प्रधान है. इसीलिए उनका रंग सांवला है. उनकी देह महलों के सुरक्षित और सुगंधित वातावरण में नहीं पनपती. वह प्रकृति के खुले में बरसात की बूंदों का आघात सहती हैंऔर सब सह-सहकर ही अपना निर्माण करती है. माथे पर आयी पसीने की बूंदे,जहाँ अभिनंदनीय है, पूज्यनीय हैं वहीं वे सामंतीय चेतना के खिलाफ़ विद्रोह का शंखनाद भी है. उस सामंतीय चेतना के विरुद्ध, जो श्रम को दुत्कार कर, विश्राम को महिमा-मंडित करती है.
जब विश्वामित्र जी आकर दशरथ जी से राम और लक्ष्मण को मांगते हैं तो पिता के कहने पर राम चल देते हैं. यह भविष्य के चौदह वर्ष के वनवास की पूर्व कीतैयारी थी.उसका पूर्वाभ्यास था. उन्होंने पिता की आज्ञा मानी और चुपचाप चल दिए. लेकिन बाद के वर्षों में वे वनवास क्यों गए? क्या उन्हें पिता ने आज्ञा दी थी?. नहीं. पिता ने तो वनगमन के लिए कहा ही नहीं था. केवल माता कैकेई के वचनों को उन्होंने पिता की आज्ञा मानी और वन जाने का निश्चय कर लिया.
"वनगमन"एक अर्थ में इस बात की प्रत्याभूति (गारंटी)भी था कि राम,न सिर्फ़ उन आक्रमणकारी दानवों से ऋषि, मुनियों, तपस्वियों के प्राणॊं को बचाएंगे, जो घने जंगलों के बीच रहकर, न केवलयज्ञादि करते हैं अपितु शस्त्र और शास्त्र का निर्माण भीकर रहे होते हैं, जिन्हें दानव आकर नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे.. वे कोई साधारण ऋषि-मुनि नहीं थे,बल्कि एक असाधारण वैज्ञानिक भी थे. "वनगमन"के बाद राम उन तक पहुँचे. वहाँ पहुँचकरवह केवल ज्ञान ही अर्जित नहीं करेंगे, बल्कि शस्त्रों से भी परिचित होतेचलेंगेऔररावण कीसत्ता को चुनौतीदेंगे..
"वनगमन"एक साधारण घटना मात्र नहीं है. यह घटना एक शासक के द्वारा, एक राजकुमार को दिए गए आदेश से जुड़ी हुई है,न कि एक पिता के द्वारा एक पुत्र को दिए गए आदेश से. इस घटना से स्पष्ट है कि राजा ने “वन-गमन”के आदेश पर अपने हस्ताक्षर किए ही नहीं थे,तो फ़िर आदेश का पालन करने का प्रश्न ही नहीं उठता था, लेकिन राम ने उसे आदेश मान लिया, जबकि वह था ही नहीं. जब उन्होंने अपना उद्देश्य निर्धारित कर लिया, तो उस उद्देश्य को पाने के लिए उन्होंने निर्ममता तथा अवज्ञा की सीमा से परे जाने में संकोच भी नहीं किया. वे स्वयं भी जानते थे कि वन जाने के बाद, पिता शायद ही जीवित रहेंगे. उनकी तीनों माताएं विधवा हो जाएंगी.
कैकेई जी भी स्वयं जानती थी कि उनके इस निर्णय से अयोध्या में भूचाल आ जाएगा. राम के वन जाते ही उन्हें वैधव्य जैसे आघात को सहना पड़ेगा. पता नहीं,लोगउनके विरुद्ध कितनी ही बाते बनाएंगे. कोई उन्हें घरफ़ोडू, कोई खलनायिका जैसे संबोधनों से संबोधित करेगा.सगा बेटा घृणा की दॄष्टि से देखेगा और तो और, निकट भविष्य में कोई परिवार, अपनी बेटियों का नाम "कैकेई"रखना पसंद करेगा. इतनासब कुछ जानने और समझने के बाद भी,वे अपने निर्णय पर अडिग रहती हैं और राम को वन जाने को कहती हैं. यदि वे राम को वन नहीं भेजतीं तो,रामकेवल राम ही बने रहते.एक शासक से बढ़कर और कुछ भी नहीं हो सकते थे.लेकिन विमाता कैकेई ने उन्हें अयोध्या की सीमा से निकालकर,समूचे आर्यावर्त के घरों-घर तक पहुँचादिया.
खलनायिकाएँकेवल घर के दो टुकड़े करवा सकती है. मन-मुटाव पैदा करवा सकती हैं. वे कभी भी ऐसा अद्भुत इतिहास सृजित नहीं कर सकतीं. अतः माता कैकेई को खलनायिका कहकर उनकाअपमान नहीं किया जा सकता.
राम कथा पर "रामायण"तीन सौ से लेकर एक हजार तक की संख्या में विविध रुपों में लिखी जा चुकी है, जिसमें वाल्मीकि रामायण सबसे प्राचीन मानी जाती है. इस गौरव ग्रंथ के कारण वे दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं. राम कथाएं अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी गयी हैं. हिंदी में 11, मराठी में 8, बांगला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12, तथा उड़िया मे 6रामायणें मिलती हैं. लेकिन अवधि (हिंदी)में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत "रामचरित मानस"ने अपना विशेष स्थान बनाया है. कई देशों के अलावा अन्य कई भाषाओं में राम कथाएं लिखीं गईं हैं. इनके अलावा और भी रामायणेंलिखी गई हैं, लेकिन अब तक 28की ही खोज की जा सकी हैं.
"वनगमन उपन्यास"में मैने कुछ प्रयोग भी किए हैं.. जैसे कि महाराज दशरथजी का कानों के पास सफ़ेद हो चुके बालों को देखना और रामजी के राज्याभिषेक करने का निर्णय लेना. निर्णय लेने से पूर्व वे अपने चारों बेटों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं. (२)श्रीराम और सीता माता द्वारा एक "आभासीय दुनिया"का निर्माण करते हुए माता कैकेई जी के पास जाना और महाराज दशरथजी से दो वर मांगने का अनुरोध करना. (३) एक जनश्रुति के अनुसार- महाराज दशरथजी का अचानक सामना बाली से होता है और वह उन्हें युद्ध के लिए ललकारता है.बाली को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था कि उसे सामने वाले की आधी शक्ति प्राप्त हो जाएगी. घनघोर युद्ध के बाद महाराज की हार होती है.युद्धजीतने पर बाली ने दो विचित्र शर्त रखी कि वे रघुकुल की शान यानि अपना मुकुट मेरे सामने रख जाएं या फ़िर कैकेई को छोड़ जाएं.अंततोगत्वामहाराजअपना मुकुट विजेता बाली को सौंप देते है.
चुंकि रानी कैकेई जी भी एक वीर योद्धा थीं,.किसी भी वीर योद्धा को यह कैसे सुहाता कि उन्हें मुकुट छॊड़कर आना पड़े. उन्हें बहुत दुःख हुआ कि रघुकुल का गौरव मुकुट उनके बदले रख छोड़ा गया है. उन्हें मुकुट को वापस लाने की चिंता हर समय लगी रहती थी. इसलिए भी उन्होंने रामजी के राजतिलक के समय रामजी के लिए वनवास मांगा था. उन्होंने श्रीरामजी से कहा था- “ तुम्हें उस मुकुट को लेकर आना होगा. मैं उसी मुकुट से तुम्हारा राजतिलक करूँगी ”.
उपरोक्त तीनों प्रसंग उपन्यास को और अधिक रोचक बनाने में सहायक बन पड़े हैं. ऐसा मेरा अपना मानना है.
रामजीअसीमित शक्तिशाली, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ जैसे दिव्य गुणॊं की खान हैं. मैं, न तो बुद्धि के बल पर, न ही चेतना के स्तर पर और न ही स्तुति के सहारे आपकी त्रिगुणात्मक शक्तियों को समग्रता के साथ समझ पाने में समर्थ हूँ. फ़िर भी मैं आपके द्वारा निर्मित मायावी संसार में आपके दर्शन के लिए तीर्थयात्राएं करता हूँ.
आप सर्वत्र उपलब्ध हैं, आप चेतना और ध्यान से परे है फ़िर भी मैं आपका ध्यान करता हूँ. आप शब्दों में नहीं बांधे जा सकते फ़िर भी मैं आपके गुणॊं का वर्णन करता हूँ. मेरेप्रयासों से हुए इन तीनों अपराधों को कृपया करके क्षमा करेंगे ऐसी मेरी विनम्र प्रार्थना है.
उपन्यास लेखन के इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए मेरा प्रयास रहेगा कि अगला उपन्यास जो “ दण्डकारण्य में राम’ नाम से प्रकाशित होगा.
मेरा अपना मानना है कि वनगमन से पूर्व उनके पास कोई “रोडमैप”नहीं था और न ही कोई पथ-प्रदर्शक. वे किसी एक ऋषि या मुनि के पास जाते, और वे उन्हें किसी अन्य के पास जाने का परामर्श देते हैं. इस तरह उनकी यात्रा अनवरत जारी रहती है.
यात्रा के पड़ाव पर मिलने वाले ऋषि या मुनि के नामों का उल्लेख तो हमें पढ़ने को मिलता है,लेकिन उनका न तो कोई परिचय मिलता है और न ही विस्तार से जानकारी. मेरी सतत कोशिश रहेगी कि मैं उनका परिचय देता चलूं.
हरि अनंत हरि कथा अनंता
रामजी एक हैं लेकिन उनकी कथाएं अनंत है. आपकी महति कृपा से मैंने अपने प्रथम उपन्यास “ वनगमन “लिखने का सायास प्रयास किया है. मैं नहीं जानता कि इसमें मैं कितना सफ़ल हो पाया हूँ?. जो कुछ भी मैं लिख पाया हूँ. यह सब आपकी ही कृपा और आशीर्वाद का सुफ़ल है.
मेरे इस उपन्यास लेखन में मित्र (प्रो).श्री राजेश्वर अनादेव, श्री सुरेन्द्र वर्मा, श्री लक्ष्मण प्रसाद डेहरिया तथा श्री रणजीत सिंह परिहार का अथक सहयोग प्राप्त हुआ है. मैं आप तीनों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ.